Book Reviews

Dopeheri (Hindi) | Pankaj Kapur | Book Review

  • Author: Pankaj Kapur
  • Hardcover: 100 pages
  • Publisher: HarperHindi (10 November 2019)
  • Language: Hindi

दोपहरी – वो वक़्त जब हम आधे दिन की थकान मिटाते हैं, जब हम बचे हुए आधे दिन का हिसाब लगाते हैं, जब हम थोड़ा गुणा भाग करते हैं, जब सन्नाटे में कभी कभार थोड़ा अधिक तन्हा महसूस करते हैं. जैसे की हमारी अम्मा बी. उन्हें डर लगता है दोपहरी के तीन बजने से. उन्हें ख़ौफ़ रहता है किसी अनजाने साये का. हर रोज़ जो वो टकटकी लगाए देखती हैं किवाड़ों को. उन्हें शायद बाहर से ज़्यादा भीतर का कुछ अधिक खाता रहता है.

पंकज कपूर की दोपहरी अम्मा बी की कहानी है और उनके साथ अन्य स्त्रीयोँ की जो भूल जाती हैं खुद को गृहस्थी की उहापोह में. अपनी सारी ज़िन्दगी घर और घर के लोगों के नाम करनी वाली अम्मा बी उम्र के अहम पड़ाव पर खुद को अकेला पाती हैं. बड़ी हवेली की अम्मा बी रुआब के साथ जीती ज़रूर हैं पर मन में कुछ अधूरापन उन्हें लगातार खटकता है. और जब किराए पर आयी सबीहा में उन्हें एक बेटी मिल जाती है तो जैसे मन में बँधी कोई गाँठ खुल ही जाती है. उनका एकांकीपन भाग खड़ा होता है. एक दिन सबीहा उनके हुनर को पहचानती है और फिर अम्मा बी भी खुद को एक मौका देती हैं। आखिरी में जब मेहनताने के रूप में उन्हें सबीहा एक चेक देती है, तो वो आसमान में ठहरे अपने उनसे कहना चाहती हैं की ये उनकी कमाई है, उनकी मेहनत की. कई मुद्दतों बाद मुमताज़ सिद्दीकी नाम सुनकर उनका एकांकी मन चहक उठता है. उन्हें अपने वजूद का एहसास होता है. और उस वक़्त में सिमटी उनकी ख़ुशी हम और आप क्या ही जानेंगे.

वो आखिरी पंक्ति जैसे पूरी कहानी का निचोड़ रख देती है. ‘कह देना उनसे, ये मेरी मेहनत का है.’ कितना सरल अपितु कितना गहरा वाक्य है ये. ये कहता है की औरतें घर भार की तमाम ज़िम्मेदारियों को पूरा करती हैं. अपने पति, पिता, बेटे, भाई, आदि में अपनी पहचान ढूंढ लेती हैं. पर क्या बस यही अर्थ है उनके जीवन का. क्या हमने स्त्री मन टटोल कर देखना चाहा है. शायद पंकज जी ने थोड़ा ठीक से पढ़ लिया है औरत को. इसलिए उनकी कहानी का अंत दिल को छूकर गहराई में उतर जाता है.

MY RATING: 5/ 5


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